West Singhbhum: नोवामुंडी कॉलेज के छात्रों ने बैतरणी के तट पर किया शैक्षणिक भ्रमण, इतिहास विभाग का विशेष प्रयास

पश्चिम सिंहभूम: नोवामुंडी कॉलेज के प्राचार्य डॉ. मनोजित विश्वास के निर्देशन में इतिहास विभाग द्वारा एक दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण का आयोजन किया गया। इस भ्रमण का नेतृत्व विभागाध्यक्ष सुमन चातोम्बा और सहायक शिक्षिका मंजू लता सिंकू ने किया। छात्र दल, जो कॉलेज से लगभग 22 किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित है, जगन्नाथपुर प्रखंड के प्राचीन बैतरणी नदी के तट पर अवस्थित रामेश्वरम मंदिर पहुँचा।

भ्रमण का उद्देश्य और छात्रों की प्रतिक्रिया
प्राचार्य डॉ. मनोजित विश्वास ने इस यात्रा का उद्देश्य छात्रों को क्षेत्रीय इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक परंपराओं से परिचित कराना बताया, ताकि वे मंदिर की स्थापत्य कला, धार्मिक महत्व और भौगोलिक स्थिति पर शोध कर सकें। मंदिर परिसर में पहुंचकर छात्रों और शिक्षिकाओं ने प्राकृतिक सौंदर्य तथा शांत वातावरण का गहराई से अनुभव किया।

रामेश्वरम मंदिर का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
मंदिर परिसर में उपस्थित रामतीर्थ मंदिर के अध्यक्ष एवं नोवामुंडी कॉलेज प्रबंध समिति सदस्य सनद प्रधान ने मंदिर की स्थापना, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पदचिह्नों और वास्तुकला के रहस्यों पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जनश्रुतियों के अनुसार त्रेता युग में श्रीराम वनवास के दौरान बैतरणी तट पर विश्राम करते हुए शिवलिंग की स्थापना की थी। स्थानीय पुजारी को स्वप्न में यह ज्ञान हुआ कि श्रीराम के पदचिह्न नदी के जल में दबे हुए हैं।

ग्रामीणों ने टाटा स्टील नोवामुंडी की सहायता से पानी के भीतर से पदचिह्न निकालकर उन्हें सुरक्षित स्थल पर स्थापित किया। इनमें से एक पदचिह्न को वास्तविक माना जाता है, जबकि अन्य कृत्रिम रूप से निर्मित हैं।

चार प्रमुख मंदिर और मकर संक्रांति मेला
1910 में ग्रामवासियों के सहयोग से इस परिसर में चार मंदिर बनाए गए – रामेश्वरम, शिव, जगन्नाथ और बजरंगी मंदिर। शिक्षाविद् मो निसार अहमद ने बताया कि मकर संक्रांति के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है, जिसमें झारखंड, ओडिशा समेत अन्य राज्यों से श्रद्धालु आते हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा और पूर्व सांसद गीता कोड़ा ने इस मंदिर के सौंदर्यीकरण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। झारखंड सरकार ने इसे हाल ही में पर्यटन स्थल घोषित किया है।

स्थापत्य कला की विशिष्टता
इस मंदिर की वास्तुकला वेसर शैली पर आधारित है, जो नागर और द्रविड़ शैली का मिश्रण है। इस शैक्षणिक भ्रमण ने छात्रों को क्षेत्रीय लोककथाओं, सांस्कृतिक धरोहरों और स्थापत्य कलाओं से जोड़ने का अनुपम अवसर प्रदान किया।

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