Saraikela : छऊ नृत्य कला के परंपरागत घराना राजेंद्र अखाड़ा में विधि विधान के साथ की गई पूजा-अर्चना

 

सरायकेला : सरायकेला छऊ नृत्य कला के मूल रहे अखाड़ा परंपरा के तहत शुक्रवार को परंपरागत राजेंद्र अखाड़ा ने सरायकेला झुमकेश्वरी स्थल पर मां झुमकेश्वरी के दरबार में मत्था टेक चैत्र पर्व का आगाज किया। इस अवसर पर अखाड़ा प्रमुख नीरज कुमार पटनायक के नेतृत्व में अपने सभी भाइयों के साथ तथा अखाड़ा के कलाकार एवं सदस्यों ने माता के दरबार में विधि विधान के साथ पूजा-अर्चना की। पुजारी देवरानी ने परंपरागत तरीके से मां झुमकेश्वरी की पूजा संपन्न कराई। मौके पर छऊ नृत्य कला का प्रदर्शन करते हुए अखाड़ा के सभी कलाकार एवं सदस्यों ने नव वर्ष के मंगलमय होने और चैत्र पर्व के खुशहाली पूर्वक संपन्न होने के लिए मां झुमकेश्वरी से मंगल प्रार्थना की। इस अवसर पर अखाड़ा के सरोज पटनायक, प्रवीण पटनायक, सुभेंदु दास, रूपेश कुमार, चंदन कवि, भगवती सामल एवं जयराज दास सहित अन्य सभी की उपस्थिति में माता की प्रसन्नता के लिए भोग प्रसाद का चढ़ावा चढ़ाया गया। और बली अर्पण की गई। परंपरा अनुसार सभी ने मां झुमकेश्वरी शक्तिपीठ स्थल पर ही प्रसाद का सेवन किया।

सरायकेला छऊ नृत्य का मूल अखाड़ा परंपरा

विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ नृत्य कला के इतिहास के जानकार बताते हैं कि सरायकेला छऊ का उत्पत्ति काल मूल रूप से आठ अखाड़ों से रहा है। जिसके प्रमुख उस्ताद कहे जाते थे। धीरे-धीरे उक्त परंपरा में शिथिलता आई। जिसके बाद छऊ नृत्य कला संस्थान बनने लगे। परंतु उक्त सभी अखाड़े परंपरा अनुसार पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत बने हुए हैं। जिसमें हंसाहुड़ी स्थित राजेंद्र अखाड़ा है। राजेंद्र अखाड़ा या अमीनो अखाड़ा के प्रथम एवं प्रमुख उस्ताद राजेंद्र पटनायक थे। जिन्होंने अपने भाई जुगल किशोर पटनायक के साथ नृत्य सृजन किया। बताया जाता है कि राजेंद्र अखाड़ा का मूल स्थान मां झुमकेश्वरी स्थल हुआ करता था। परंतु समीप से बह रही खरकाई नदी में बाढ़ आने के पश्चात अखाड़े का स्थानांतरण वर्तमान के हंसाहुड़ी में हो गया।

बच्चों को छऊ नृत्य की शिक्षा दी जा रही है

उसके पश्चात राजेंद्र पटनायक के पुत्र नटशेखर बन बिहारी पटनायक कई अविस्मरणीय नृत्यों का सृजन किया। जो आज भी प्रचलन में बने हुए हैं। नटशेखर बन बिहारी पटनायक सरकार द्वारा स्थापित किए गए राजकीय छऊ नृत्य कला के प्रथम निदेशक बने। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके दोनों पुत्र अबनीकांत पटनायक एवं राधाकांत पटनायक ने राजेंद्र अखाड़े की परंपरा को जारी रखा। उक्त दोनों की मृत्यु हो जाने के पश्चात वर्तमान में अबनीकांत पटनायक के पुत्र नीरज कुमार पटनायक राजेंद्र अखाड़ा की परंपरा को जारी रखे हुए हैं। साथ ही राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र को सहयोग प्रदान करते हुए अपने घर में ही बच्चों को छऊ नृत्य की शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं।

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