Saraikela: दलमा में सड़क की हालत ने रोका जंगल सफारी का उत्साह, इको-पर्यटन के नाम पर लूट और लाचारी की दास्तान

सरायकेला: चाकुलिया गांव के समीप दलमा चौक से दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की ओर जाने वाली सड़क की स्थिति गंभीर रूप से खराब है. दलमा टॉप, पिंडराबेड़ा और माकुलकोचा जैसे स्थलों तक जाने वाले रास्ते गड्ढों से भरे हुए हैं. बरसात के कारण इनमें पानी भर जाता है, जिससे बाइक सवार पर्यटक गिरते रहते हैं.

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि प्रतिदिन इस सड़क से सैकड़ों लोग गुजरते हैं. चालियामा, फाड़ेगा, बांधडीह और बोड़ाम जैसे इलाकों के लोग इस मार्ग पर निर्भर हैं. बारिश के मौसम में यह रास्ता बेहद फिसलन भरा और कीचड़युक्त हो जाता है, जिससे हादसे की आशंका बनी रहती है.

लाखों का राजस्व, फिर भी सड़कों की अनदेखी
दलमा सेंचुरी से वन विभाग को प्रतिमाह करीब 2 लाख रुपये से अधिक का राजस्व मिलता है. पर्यटकों से सफारी के लिए 2800 रुपये, म्यूजियम प्रवेश के लिए 100 रुपये, निजी वाहनों के लिए 600 रुपये और प्रति व्यक्ति 10 रुपये शुल्क लिया जाता है.

स्मारिका केंद्र खुद संकट में
माकुलकोचा चेकनाका स्थित सूचना कियोस्क सह स्मारिका दुकान, जिसे करीब 70 लाख रुपये की लागत से लकड़ी से बनाया गया था, अब जीर्ण-शीर्ण स्थिति में पहुंच गया है. लकड़ी की पट्टियाँ टूटने लगी हैं. हाल ही में एक पर्यटक का पैर लकड़ी में धँस गया, जिसके बाद उस स्थान पर आनन-फानन में रिंग की जाली लगाई गई.

पर्यावरण के नाम पर दिखावा?
वशिष्ठ सिंह और बाबूराम किस्कू ने आरोप लगाया कि इको-सेंसेटिव जोन घोषित किए जाने के बावजूद विकास कार्य ठप हैं. आदिवासी समुदाय को डरा-धमकाकर विकास की आड़ में शोषण किया जा रहा है. क्षेत्र के शिक्षित युवकों को स्वरोजगार योजनाओं से जोड़ने की बात सिर्फ कागज़ों तक सीमित है.

हाथी गायब, पर्यटक मायूस
कभी दलमा की घाटियों में हाथियों के झुंड आम बात थी. पर्यटक जलाशयों में उन्हें निहारने आते थे. पर अब हालात ऐसे हो गए हैं कि गिनी-चुनी sighting ही हो रही है. गज परियोजना के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद हाथी पलायन कर चुके हैं. बताया गया है कि अब ये झुंड ईचागढ़ क्षेत्र में सक्रिय हैं.

सावन में उमड़ती भीड़, प्रशासनिक तैयारी शून्य
सावन के महीने में दलमा बूढ़ा बाबा की गुफा मंदिर में जलाभिषेक और पूजा के लिए पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ सहित झारखंड भर से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं. लेकिन जिस मार्ग से ये श्रद्धालु आते हैं, उसकी हालत खस्ताहाल बनी हुई है.

क्या उठाएगा वन विभाग कोई ठोस कदम?
पर्यावरण और पर्यटन के नाम पर राजस्व तो हो रहा है, लेकिन सुविधा और सुरक्षा की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं हो रहा. अब जरूरी है कि सड़क की मरम्मत हो, इको टूरिज्म के नाम पर लटके प्रोजेक्ट्स को जमीन पर उतारा जाए और आदिवासी समुदाय के युवाओं को वास्तविक रूप से रोजगार से जोड़ा जाए.

इसे भी पढ़ें : Gamharia: बरसात बनी मुसीबत, वृद्धा का मकान जमींदोज – सहमा परिवार


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