
नई दिल्ली : लोकसभा को मंगलवार को सूचित किया गया कि नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत केंद्र सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह भारत के प्रत्येक नागरिक का रजिस्ट्रेशन करे और उन्हें राष्ट्रीय पहचान पत्र (National Identity Card) जारी करे। यह प्रावधान 2004 में किए गए संशोधन के तहत लागू होता है और इसका उद्देश्य नागरिकता रिकॉर्ड को व्यवस्थित और प्रमाणिक बनाना है।
दरअसल, यह जानकारी गृह मंत्रालय की ओर से दी गई, जब तृणमूल कांग्रेस की सांसद माला रॉय ने राष्ट्रीय पहचान पत्र के विवरण को लेकर सवाल किया था। उन्होंने पूछा था कि क्या यह कार्ड भारतीय नागरिकता का स्वीकार्य प्रमाण माना जाता है।
जवाब में गृह राज्य मंत्री बंदी संजय कुमार ने एक लिखित उत्तर में कहा, ‘नागरिकता अधिनियम 1955, जिसे वर्ष 2004 में संशोधित किया गया था, केंद्र सरकार को प्रत्येक भारतीय नागरिक का अनिवार्य पंजीकरण करने और उन्हें राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करने का अधिकार देता है।
यह प्रक्रिया राष्ट्रीय पहचान पत्र नियमों में निर्धारित की गई है। ये पहचान पत्र उन्हीं नागरिकों को जारी किए जा सकते हैं, जिनका विवरण राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) या भारतीय नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर में शामिल हो।’
असम बना देश का इकलौता राज्य जहां शुरू हुई NRC प्रक्रिया
असम, देश का एकमात्र राज्य है जहां एनआरसी की प्रक्रिया शुरू की गई थी। हालांकि, 2019 में प्रकाशित मसौदा एनआरसी, जिसमें 3.29 करोड़ आवेदकों में से 19 लाख को बाहर कर दिया गया था, को राज्य सरकार ने चुनौती दी है। इसी कारण अब तक अंतिम एनआरसी प्रकाशित नहीं किया गया है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि जनगणना 2027 के दौरान राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) को अद्यतन करने को लेकर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
गौरतलब है कि एनपीआर को एनआरसी की दिशा में पहला कदम माना जाता है। इसे पहली बार 2010 में संकलित किया गया था और 2011 की जनगणना के पहले चरण (हाउस लिस्टिंग और हाउसिंग अनुसूची) के दौरान भी आंकड़े जुटाए गए थे। एनपीआर डेटाबेस को 2015-16 में आखिरी बार अपडेट किया गया था, जिसमें 119 करोड़ निवासियों का विवरण दर्ज है।
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