अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पु ने केंद्रीय शांति समिति की वर्तमान भूमिका और गतिविधियों की समीक्षा करने की मांग की
जमशेदपुर : कभी जिले में केंद्रीय शांति समिति की भूमिका त्योहारों के दौरान काफी महत्वपूर्ण मानी जाती थी। दुर्गा पूजा सहित अन्य प्रमुख त्योहारों में पुलिस-प्रशासन, पूजा समितियों और आम जनता के बीच समन्वय स्थापित करने में समिति के वरिष्ठ सदस्यों की सक्रिय भूमिका दिखाई देती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में केंद्रीय शांति समिति की सक्रियता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। एवं जिला प्रशासन के किस उच्च पदाधिकारी का आदेशनुसार थाना प्रभारी एवं पुलिस पदाधिकारी स्वयंसेवी संस्था में पहुंच कर तथाकथित समिति के साथ बैठक करते हैं जबकि वहीं पुलिस पदाधिकारी शांति समिति की बैठक से गायब रहते हैं
शहर में इन दिनों चर्चा है कि केंद्रीय शांति समिति से लेकर थाना स्तर पर गठित शांति समितियों तक कई जगहों पर गतिविधियां महज बैठकों और औपचारिकता तक सीमित होती जा रही हैं। जिस समिति का उद्देश्य पुलिस और आम जनता के बीच संवाद तथा आपसी विश्वास कायम करना था, उसमें सक्रिय सामाजिक भागीदारी कितनी है, यह भी सवालों के घेरे में है।
इसी बीच जमशेदपुर दुर्गा पूजा केंद्रीय समिति के अध्यक्ष अचिन्त्यम गुप्ता और उनके सहयोगियों पर लाखों रुपये के गबन के आरोप लगाए जाने का मामला सामने आया है। जानकारी के अनुसार, समिति से जुड़े कुछ पूर्व पदाधिकारियों और सदस्यों ने इस संबंध में सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट में समिति के पंजीकरण, आमसभा, आय-व्यय के लेखा-जोखा और ऑडिट को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें समिति के पूर्व सचिव अरुण सिंह के हवाले से समिति के गठन और नियमावली से जुड़े दावे किए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि समिति द्वारा दुर्गा पूजा समितियों से आर्थिक सहयोग लिया जाता है, लेकिन उस राशि के उपयोग और लेखा-जोखा को लेकर पारदर्शिता पर सवाल हैं।
यह मामला केवल किसी एक संस्था या व्यक्ति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। असली सवाल यह है कि जो संगठन जिला स्तर पर शांति, समन्वय और सामाजिक व्यवस्था में भूमिका निभाने का दावा करते हैं, उनकी कार्यप्रणाली कितनी पारदर्शी है? यदि किसी संस्था द्वारा पूजा समितियों से आर्थिक सहयोग लिया जाता है तो उसकी आय-व्यय व्यवस्था, ऑडिट और सार्वजनिक जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए।
शहर में स्वयंसेवी संस्थाओं और पूजा के नाम पर गठित विभिन्न संगठनों की बढ़ती संख्या को लेकर भी चर्चा है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ संस्थाएं सामाजिक समन्वय के बजाय अपने सीमित दायरे में गतिविधियां संचालित कर रही हैं। ऐसे आरोपों की जांच और वास्तविकता सामने लाना प्रशासन तथा संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल केंद्रीय शांति समिति को लेकर है। यदि जिला स्तर की केंद्रीय समिति ही प्रभावी तरीके से सक्रिय नहीं होगी तो उसका असर थाना स्तर की शांति समितियों पर भी पड़ना स्वाभाविक है। कई क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर ऐसे लोगों की भागीदारी की जरूरत महसूस की जा रही है, जिनकी सामाजिक स्वीकार्यता हो और जो पुलिस तथा आम जनता के बीच संवाद स्थापित कर सकें।
शांति समिति किसी व्यक्ति विशेष, संस्था विशेष या चंद चुनिंदा लोगों का मंच नहीं, बल्कि प्रशासन और समाज के बीच संवाद का माध्यम होनी चाहिए। इसलिए जिला प्रशासन को चाहिए कि केंद्रीय शांति समिति की वर्तमान भूमिका और गतिविधियों की समीक्षा करे। समिति की बैठकों, सदस्यता, कार्यप्रणाली और यदि आर्थिक गतिविधियां होती हैं तो उनके लेखा-जोखा में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
साथ ही थाना स्तर की शांति समितियों को भी सक्रिय कर स्थानीय सामाजिक लोगों, जनप्रतिनिधियों, पूजा समितियों और पुलिस के बीच नियमित संवाद की व्यवस्था होनी चाहिए। त्योहारों के दौरान सिर्फ बैठक कर खानापूर्ति करने के बजाय जमीन पर काम करने वाली व्यवस्था की जरूरत है।
अब सवाल यह है कि केंद्रीय शांति समिति और उससे जुड़ी संस्थाएं वास्तव में शांति एवं सामाजिक समन्वय के लिए सक्रिय होंगी या फिर उनका अस्तित्व सिर्फ बैठकों, पदों और त्योहारों के मौसम तक सीमित रहेगा?
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