नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।
स्पीकर ने बताया कि उन्हें भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद और विपक्ष के नेता समेत 146 सांसदों के हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव मिला। प्रस्ताव में जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की मांग की गई है।
जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति
स्पीकर ने इस मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई है—
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार
मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव
वरिष्ठ वकील बी. वी. आचार्य
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स्पीकर का बयान
बिरला ने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है। सुप्रीम कोर्ट ने भी आरोपों को गंभीर पाया है और इनहाउस जांच प्रक्रिया पूरी की गई है। सीजेआई ने भी माना कि गहन जांच जरूरी है। संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत बेदाग चरित्र न्यायपालिका में विश्वास की नींव है और इस मामले के तथ्य भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं।
कैसे शुरू हुआ मामला
14 मार्च 2025 की रात दिल्ली में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगी। फायर ब्रिगेड को वहां स्टोर रूम में ₹500 के जले हुए नोटों के बंडल मिले।
जस्टिस वर्मा ने कहा कि उनके पास कोई नकदी नहीं थी और उन्हें साजिश के तहत फंसाया गया। 21 मार्च की मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि उनके घर से 15 करोड़ रुपये मिले थे। अगले दिन सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं मिली राहत
जस्टिस वर्मा ने जांच रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की, लेकिन 7 अगस्त को कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ए. जी. मसीह की पीठ ने कहा कि उनका आचरण विश्वास से परे है और जांच पूरी तरह वैध तरीके से हुई है।
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जांच में क्या पाया गया
21 मार्च: दिल्ली हाईकोर्ट ने इंटरनल जांच शुरू की और रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी।
22 मार्च: सीजेआई संजीव खन्ना ने तीन सदस्यीय समिति बनाई और कैश का वीडियो सार्वजनिक किया।
3-4 मई: समिति ने जस्टिस वर्मा को दोषी पाया।
8 मई: CJI संजीव खन्ना ने PM और राष्ट्रपति को महाभियोग की सिफारिश की।
19 मई: पैनल की रिपोर्ट में कहा गया कि स्टोर रूम पर जस्टिस वर्मा और उनके परिवार का नियंत्रण था, जहां अधजले नोट मिले थे।
क्या है महाभियोग प्रस्ताव?
महाभियोग प्रस्ताव (Impeachment Motion) एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसके तहत किसी उच्च पद पर बैठे व्यक्ति — जैसे भारत में राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज — को उनके पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाया जाता है।
भारत में महाभियोग प्रस्ताव की मुख्य बातें
किसके खिलाफ लाया जा सकता है
- राष्ट्रपति (अनुच्छेद 61 के तहत)
- सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज (अनुच्छेद 124(4) और 217 के तहत)
कब लाया जाता है
जब उन पर संविधान के उल्लंघन, दुराचार, भ्रष्टाचार, या पद के दुरुपयोग के गंभीर आरोप हों।
कौन लाता है
संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में सदस्य महाभियोग प्रस्ताव ला सकते हैं।
समर्थन की ज़रूरत
प्रस्ताव पेश करने से पहले, कुल सदस्यों के कम से कम 1/4 (चौथाई) का लिखित समर्थन होना चाहिए।
जांच प्रक्रिया
प्रस्ताव पर चर्चा से पहले, आरोपों की जांच के लिए एक समिति बनाई जाती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, और एक वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ होते हैं।
पारित करने की शर्त
किसी भी सदन में प्रस्ताव को विशेष बहुमत (दो-तिहाई उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्य, तथा कुल सदस्य संख्या का आधा) से पास करना होता है।
दोनों सदनों में पास होने के बाद ही व्यक्ति को पद से हटाया जा सकता है।
महाभियोग प्रस्ताव एक तरह का “पद से निकालने का कानूनी तरीका” है, लेकिन यह सिर्फ संसद के ज़रिए और बहुत सख्त बहुमत से ही हो सकता है।
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