जमशेदपुर: हिन्दू समाज में शारदीय दुर्गा पूजा का महत्व केवल उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी आध्यात्मिक और धार्मिक कथा जुड़ी है। माँ दुर्गा को आदि शक्ति माना जाता है, जो सृष्टि की जननी हैं। सत्य युग में महिषासुर के अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर की तेज़ राशि से देवी दुर्गा का सृजन हुआ था। सभी देवताओं ने अपनी शक्ति और अस्त्र प्रदान कर उन्हें सक्षम बनाया और अंततः देवी दुर्गा ने युद्ध क्षेत्र में महिषासुर का वध कर देवकुल को शांति प्रदान की।
कालांतर में महाराजा सुरथ ने मेधस मुनि के आश्रम में राज्य और शांति की प्राप्ति के लिए बसंत काल में माँ दुर्गा की प्रथम पूजा का आयोजन किया। इसे बसंती पूजा कहा गया, जो असली दुर्गा पूजा के रूप में मान्यता प्राप्त है। हालांकि, हिन्दू समाज में यह प्रथा उतनी लोकप्रिय नहीं रही।
बंगला कृत्तिवास रामायण के अनुसार त्रेता युग में भगवान राम ने रावण का वध करने के लिए शारदीय दुर्गा पूजा की थी। युद्ध के दौरान राम के बाण रावण तक नहीं पहुँच रहे थे। तब बिभीषन ने सुझाव दिया कि देवी दुर्गा की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाए।
शरदकाल में, षष्ठी से लेकर अश्टमी तक दुर्गा पूजा की विधि अनुसार पूजा की जाती है। कथा अनुसार 108 नील कमल संधि पूजा के लिए आवश्यक थे, जिन्हें हनुमान जी मानस सरोवर से लाए। अंतिम समय में एक कमल गायब होने पर लक्ष्मण ने रामचंद्र जी की एक आँख का कमल रूप में अर्पण करने का सुझाव दिया। इससे देवी दुर्गा प्रसन्न हुईं और राम को रावण वध का वर प्रदान किया।
नवमी के दिन राम और रावण का युद्ध हुआ, रावण मारा गया और दशमी के दिन विजय उत्सव मनाया गया। शारदीय दुर्गा पूजा का मूल संदेश यही है कि शुभ शक्ति का उदय अशुभ शक्ति पर, धर्म की विजय अधर्म पर, सत्य की जीत असत्य पर और न्याय की जीत अन्याय पर होती है।
शारदीय दुर्गा पूजा: आज का महत्व
आज यह पूजा न केवल भारत में बल्कि विश्व के कई देशों में बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। यह उत्सव भक्ति, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक है। देवी दुर्गा की आराधना से व्यक्ति और समाज में अशुभ शक्तियों पर विजय संभव होती है।
जय माँ दुर्गा!
– सुनील कुमार दे
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