चाईबासा: झारखंड के प्रसिद्ध सारंडा जंगल को लेकर सरकार और स्थानीय ग्रामीणों के बीच तनाव बढ़ गया है। राज्य सरकार इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने की योजना पर काम कर रही है, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के कारण शनिवार को प्रस्तावित ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का नंदपुर दौरा स्थगित करना पड़ा।
सारंडा जंगल और आसपास करीब 75,000 आदिवासी और अन्य ग्रामीण रहते हैं। उनकी आजीविका मुख्यतः जंगल आधारित संसाधनों—लकड़ी, पत्ते, चारा, शिकार, लघु वनोपज और खेती—पर निर्भर है। ग्रामीणों का कहना है “जंगल है तो हम हैं। अगर जंगल नहीं रहेगा तो हम भी नहीं रहेंगे।” उनकी चिंता है कि अभयारण्य बनने पर उनकी रोज़ी-रोटी और पैतृक भूमि दोनों प्रभावित होंगे।
सरकार की पहल और सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सारंडा को संरक्षित क्षेत्र बनाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हो रही है। अदालत ने सरकार से कहा है कि वह वन्यजीव संरक्षण के ठोस कदम उठाए और सभी वर्गों की राय ले। सरकार ने इस दिशा में 5 सदस्यीय ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन किया है। अध्यक्ष वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर हैं। अन्य सदस्य: दीपिका सिंह पांडेय, संजय प्रसाद यादव, सुदिव्य कुमार सोनू और दीपक बीरूआ। 30 सितंबर को भी मंत्रियों की टीम का दौरा हुआ था, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के कारण उसे रद्द करना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई
इस मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में होगी। तब तक सरकार को ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और समाज के अन्य वर्गों से राय लेकर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है।
सारंडा जंगल एशिया का सबसे बड़ा साल वन है और झारखंड व देश की जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र भी। यहाँ कई दुर्लभ वन्यजीव, पक्षी और वनस्पतियां पाई जाती हैं। सरकार इसे संरक्षण क्षेत्र में बदलना चाहती है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या संरक्षण की कीमत पर हजारों लोगों की आजीविका और जीवन खतरे में आ जाएंगे। यह मुद्दा अब राजनीति, आदिवासी अस्मिता और वन्यजीव संरक्षण तीनों से जुड़ गया है।
There is no ads to display, Please add some


















































