Tribute : गुवा के वीर शहीदों का बलिदान झारखंड की संघर्षशील पहचान और जन अधिकारों की लड़ाई का महत्वपूर्ण अध्याय है : सोनाराम सिंकू

गुवा के वीर शहीदों को विधायक सोनाराम सिंकु ने किया नमन, झारखंडवासियों की सुख-समृद्धि व शांति के लिए की पूजा-अर्चना

गुवा  (संगीता पाण्डेय) : गुवा के वीर शहीदों को नमन करते हुए जगन्नाथपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक सह उप मुख्य सचेतक (सत्तारूढ़ दल) एवं कांग्रेस जिलाध्यक्ष सोनाराम सिंकू कांग्रेसियों के साथ गुवा स्थित शहीद स्थल पहुंचे। इस अवसर पर विधायक सोनाराम सिंकू ने गुवा के वीर शहीदों को श्रद्धापूर्वक नमन एवं श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने शहीद स्थल पर विधिवत पूजा-अर्चना कर जगन्नाथपुर विधानसभा क्षेत्र सहित पूरे झारखंडवासियों की सुख-समृद्धि, शांति एवं खुशहाली की कामना की। विधायक सोनाराम सिंकू ने कहा कि गुवा के वीर शहीदों का बलिदान झारखंड की संघर्षशील पहचान और जन अधिकारों की लड़ाई का महत्वपूर्ण अध्याय है। शहीदों के त्याग और संघर्ष को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनकी शहादत आने वाली पीढ़ियों को अपने अधिकार, जल-जंगल-जमीन और सम्मान की रक्षा के लिए सदैव प्रेरित करती रहेगी।उन्होंने कहा कि शहीदों के सपनों का झारखंड बनाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसके लिए समाज के हर वर्ग को एकजुट होकर शांति, विकास और सामाजिक न्याय के मार्ग पर आगे बढ़ना होगा।
बताया जाता है कि बीते 8 सितंबर 1980 को गुवा में हुए गोलीकांड में 11 आदिवासी शहीद हो गए थे। इन शहीदों की याद में हर साल 8 सितंबर को श्रद्धांजलि दी जाती है। गुवा गोलीकांड उस आंदोलन की याद दिलाता है जो जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए किया गया था । गुवा का गोलीकांड झारखंड अलग राज्य आंदोलन, वनों पर वनवासियों का अधिकार व गुवा खदान से निकलने वाले लाल पानी से प्रभावित व बंजर हो रही खेतों को नुकसान पहुंचाने से रोकने से जुड़ी हुई है। गुवा गोलीकांड में दर्जनों आदिवासी आंदोलनकारी शहीद और दर्जनों घायल हुये थे ।उल्लेखनीय है कि वर्ष 1980 के दशक में झारखंड आंदोलन के नाम पर राज्य के अन्य जिलों से आए ग्रामीणों द्वारा भारी पैमाने पर सारंडा के जंगलों की कटाई कर मैदान बना, उस वन भूमि पर कब्जा करने का कार्य चल रहा था ।

इसके खिलाफ गुवा वन विभाग ने कार्रवाई करते हुये इस अभियान में शामिल लोगों समेत कुछ निर्दोषों को भी पकड़ कर जेल भेजना प्रारंभ कर दिया गया था।हालांकि उस समय झारखंड अलग राज्य को लेकर पूरे राज्य में व्यापक आंदोलन चल रहा था ।उसी समय यह कार्य भी सारंडा में झारखंड आंदोलन के नाम पर जारी था। इसके खिलाफ वन विभाग की कार्रवाई ने आग में घी डाल का काम किया। परिणाम स्वरूप  8 सितम्बर 1980 की घटना घटी। यह घटना झारखंड राज्य के निर्माण का टर्निंग पॉइंट था । आंदोलनकारियों की मेहनत रंग लायी एवं झारखंड-बिहार राज्य से अलग हो एक नया झारखंड राज्य के रूप में परिवर्तित हुआ । इस अवसर पर दर्जनों कार्यकर्ता सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित रहे।

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