जनगणना से पहले धर्म कोड को मान्यता दिलाने की मांग
जमशेदपुर : दिसोम जाहेरथान, करनडीह में माझी पारगना माहाल पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था धाड़ दिशोम की महत्वपूर्ण बैठक देश परगना बाबा बैजू मुर्मू की अध्यक्षता में हुई। बैठक में एनआईटी जमशेदपुर के एक कार्यक्रम में राष्ट्रीय जनजाति आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा द्वारा सरना को धर्म नहीं, बल्कि पूजा स्थल बताए जाने संबंधी बयान पर कड़ा विरोध जताया गया। उपस्थित लोगों ने बयान को हास्यास्पद बताते हुए कहा कि विशेषकर शिक्षण संस्थानों में धर्म की व्याख्या करना उचित नहीं है।
बैठक में कहा गया कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समाज के अलग-अलग समुदायों की अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्थाएं हैं। वक्ताओं ने कहा कि सरना धर्म को मानने वाले आदिवासियों की संख्या बड़ी है और समाज लंबे समय से अपनी धार्मिक पहचान के रूप में सरना धर्म को मान्यता देने की मांग करता रहा है।
माहाल के पदाधिकारियों ने कहा कि 2011 की जनगणना में बड़ी संख्या में आदिवासियों ने सरना धर्म का उल्लेख किया था। आगामी जनगणना 2027 से पहले केंद्र सरकार से धर्म कोड के लिए अलग कॉलम को मान्यता देने की मांग दोहराई गई।
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान को लेकर किसी भी प्रकार की टिप्पणी से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरना धर्म के संबंध में अनर्गल बयानबाजी से आदिवासी समाज को दिग्भ्रमित करने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही चेतावनी दी गई कि सरना धर्म के खिलाफ बयानबाजी जारी रहने पर समाज अपनी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के तहत कार्रवाई पर विचार करेगा।
बैठक में हरिपदो मुर्मू, दसमत हांसदा, पुन्ता मुर्मू, लखन मार्डी, देश पारानिक बाबा दुर्गाचरण मुर्मू, नवीन मुर्मू, सुनील सोरेन, गोपाल हांसदा, सुखराम किस्कू, रेंटा मुर्मू, लेदेम मुर्मू, कारू मुर्मू, शंकर हेंब्रोम, विश्वनाथ मार्डी, सालखू सोरेन, जीतू मुर्मू, बिपिन चंद्र मुर्मू, सुशील मुर्मू, वीर सिंह बास्के, सुनील मुर्मू सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित थे।
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