Bangladesh: ‘राजनीतिक बदला’ बनाम ‘प्रत्यर्पण संधि’ – हसीना की वापसी पर भारत का कड़ा रुख, जानें क्या होंगे नतीजे

नई दिल्ली:  इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल (ICT) कोर्ट ने 17 नवंबर को बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सज़ा सुनाई है। हसीना 2024 से ही भारत में शरण लिए हुए हैं और बांग्लादेश लगातार भारत पर उन्हें वापस सौंपने का दबाव बना रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि भारत किसी भी कीमत पर हसीना को नहीं लौटाएगा और इसके लिए प्रत्यर्पण संधि (Extradition Treaty) का सहारा ले सकता है।

क्या है भारत-बांग्लादेश की प्रत्यर्पण संधि?
भारत और बांग्लादेश के बीच 28 जनवरी 2013 को प्रत्यर्पण संधि हुई थी, जिसे 2016 में संशोधित कर लागू किया गया।

मुख्य प्रावधान: यह संधि आतंकवाद, हत्या, अपहरण, ड्रग तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर अपराधों में अपराधियों को एक-दूसरे को सौंपने की अनुमति देती है।

बचाव का आधार: संधि में स्पष्ट किया गया है कि राजनीतिक अपराधों में प्रत्यर्पण नहीं होगा। साथ ही, यदि आरोपी को उसके देश में मौत की सज़ा हो सकती है, तो सौंपने से पहले फांसी न दिए जाने की लिखित गारंटी लेना आवश्यक है।

प्रक्रिया में सरलता: 2016 के संशोधन ने प्रक्रिया को आसान और तेज़ बना दिया, जिसके बाद प्रत्यर्पण के लिए केवल सक्षम कोर्ट का गिरफ्तारी वारंट दिखाना काफी है। इस संधि के तहत अतीत में उल्फा नेता अनूप चेतिया और शेख मुजीबुर रहमान के हत्यारे दोषियों को सौंपा जा चुका है।

भारत क्यों कर सकता है प्रत्यर्पण से इनकार?
प्रत्यर्पण संधि में कई अपवाद हैं, जो भारत को हसीना को वापस न भेजने की कानूनी छूट देते हैं:

राजनीतिक अपराध का आधार (अनुच्छेद 6): भारत हसीना के खिलाफ चल रहे ICT ट्रायल को ‘राजनीतिक बदला’ मान सकता है, जैसा कि हसीना ने खुद दावा किया है। संधि कहती है कि अगर अपराध ‘राजनीति के लिए’ किया गया हो, तो प्रत्यर्पण से मना किया जा सकता है।

न्याय के हित में न होने का आधार (अनुच्छेद 8): यदि भारत को लगता है कि हसीना को निष्पक्ष ट्रायल नहीं मिला है, जजों पर सरकारी दबाव था, या ट्रिब्यूनल का उद्देश्य न्याय नहीं, बल्कि राजनीतिक दमन था, तो भारत प्रत्यर्पण से मना कर सकता है। हसीना का ट्रायल उनकी अनुपस्थिति में और जल्दबाजी में पूरा हुआ, जिसे भारत ‘अन्यायपूर्ण या दमनकारी’ करार दे सकता है।

भारत क्यों नहीं सौंपेगा हसीना को? तीन बड़ी वजहें
विदेश मामलों के जानकारों के अनुसार, भारत किसी भी कीमत पर शेख हसीना को वापस नहीं सौंपना चाहता है। इसकी तीन प्रमुख रणनीतिक वजहें हैं:

कट्टरपंथी ताकतों पर नियंत्रण: बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद कट्टरपंथी ताकतों का प्रभाव बढ़ा है, जो पाकिस्तान से हमदर्दी रखते हैं। हसीना को पनाह देने से वहां भारत-विरोधी भावनाएं बढ़ेंगी, लेकिन उन्हें सौंपने से सीमावर्ती इलाकों में अस्थिरता और असुरक्षा बढ़ सकती है।

पूर्वोत्तर सुरक्षा और सहयोग: हसीना के 15 साल के शासनकाल में भारत-बांग्लादेश के रिश्ते मज़बूत रहे। उन्होंने पूर्वोत्तर के उग्रवादियों (जैसे उल्फा) के प्रत्यर्पण में सहयोग किया और चीन के प्रभाव को सीमित रखा। उन्हें सौंपने पर यह सारा सहयोग खत्म हो सकता है, जिससे भारत की सीमा सुरक्षा को भारी नुकसान होगा।

आंतरिक और बाहरी समर्थन: भारत में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों का एक बड़ा वर्ग हसीना को समर्थन देता है। भारत आर्थिक रूप से मज़बूत है, इसलिए प्रत्यर्पण से इनकार करने पर संबंध टूटेंगे नहीं, लेकिन प्रत्यर्पण से फ़ायदा कम और नुकसान ज्यादा है।

हसीना को न लौटाने के परिणाम
डॉ. राजन कुमार जैसे विशेषज्ञों के अनुसार, हसीना को वापस न करने पर द्विपक्षीय संबंधों में तनाव बढ़ेगा, जिसके चार बड़े नतीजे हो सकते हैं:

राजनीतिक रिश्तों में दरार: बांग्लादेश की अंतरिम सरकार इसे ‘अत्यधिक अमित्र व्यवहार’ बताएगी, जिससे कूटनीतिक अलगाव बढ़ेगा। द्विपक्षीय बैठकें रद्द हो सकती हैं और क्षेत्रीय मंचों पर भारत को अलग-थलग महसूस हो सकता है।

सीमा सुरक्षा और घुसपैठ में वृद्धि: 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा पर सहयोग कम होगा और अवैध घुसपैठ (असम, त्रिपुरा में) बढ़ सकती है, जिससे पूर्वोत्तर में स्थानीय असंतोष भड़केगा।

आर्थिक सहयोग में कमी: दोनों देशों के बीच $14 बिलियन का व्यापार प्रभावित होगा। बांग्लादेश ‘बॉयकॉट इंडिया’ अभियान चला सकता है, और पूर्वोत्तर में चल रहे बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स (जैसे अखौरा-अगरतला रेल) रुक सकते हैं।

क्षेत्रीय भू-राजनीति पर असर: तनाव बढ़ने से बांग्लादेश पाकिस्तान और चीन के और करीब जा सकता है, जो भारत को घेरने की फिराक में हैं। इससे भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी कमजोर पड़ सकती है और बंगाल की खाड़ी तक असुरक्षा बढ़ सकती है।

शेख हसीना पर लगे आरोप और आगे का रास्ता
ICT कोर्ट में शेख हसीना पर प्रदर्शनकारियों को दबाने, घातक हथियारों के इस्तेमाल का आदेश देने और हत्याओं (जिसमें छह निहत्थे प्रदर्शनकारियों को गोली मारकर हत्या करने का आरोप भी शामिल है) समेत पाँच गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

हसीना अब ट्रिब्यूनल के फैसले को बांग्लादेश की ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकती हैं और अनफेयर ट्रायल का हवाला देकर रिव्यू मांग सकती हैं। इसके अलावा, वह भारत या किसी अन्य देश में जान को खतरा बताकर राजनीतिक शरण या सुरक्षा की मांग कर सकती हैं।

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