बहरागोड़ा: झारखंड की बहरागोड़ा प्रखंड क्षेत्र में बहने वाली स्वर्णरेखा नदी आज भी कई परिवारों के लिए रोज़गार का मुख्य साधन बनी हुई है। नदी की रेत में छोटे-छोटे सोने के कण पाए जाते हैं, जिन्हें पीढ़ियों से स्थानीय लोग इकट्ठा कर अपना जीवनयापन कर रहे हैं।
बार्णीपाल गांव के निवासी सुबह होते ही नदी के किनारे रेत छानने का काम शुरू कर देते हैं। ये सोने के कण चावल के दाने के बराबर या उससे भी छोटे होते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि दिनभर मेहनत करने के बाद उन्हें कुछ मात्रा में सोने के कण मिलते हैं। स्थानीय सोनार इन कणों को खरीदते हैं, जिससे इन परिवारों को रोज़गार और आजीविका मिलती है।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला रहा यह काम
यह सिर्फ रोज़गार का साधन नहीं, बल्कि इन परिवारों की संस्कृति और विरासत भी है। बच्चों से लेकर बड़ों तक, सभी इस काम में पारंगत हैं। मानसून के समय को छोड़कर लगभग पूरे साल यह काम चलता रहता है और यह ग्रामीणों की जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
वैज्ञानिक भी हैं हैरान
स्वर्णरेखा नदी झारखंड से निकलकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है। भू-वैज्ञानिकों के लिए भी यह एक रहस्य बना हुआ है कि नदी में सोने के कण क्यों और कहां से आते हैं। कुछ का मानना है कि नदी चट्टानों से होकर बहती है, जिससे सोना मिलता है, लेकिन कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है।
स्थानीय लोग इसे ईश्वरीय वरदान मानते हैं।
बहरागोड़ा के इन गांवों के लिए स्वर्णरेखा नदी सचमुच में ‘सोने की लकीर’ है। यह उनकी गरीबी को दूर करने और जीवन को संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह कहानी नदी के रहस्य के साथ-साथ मेहनती ग्रामीणों की संघर्षपूर्ण जीविकोपार्जन यात्रा की भी झलक देती है।
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