Saraikela: दूसरी सोमवारी को जयदा मंदिर में उमड़ेगी आस्था की बाढ़, प्रशासन अलर्ट – सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम

सरायकेला:  सरायकेला जिले के चांडिल अनुमंडल स्थित सुवर्णरेखा नदी के किनारे और दलमा जंगल की तराई में स्थित जयदा बूढ़ा बाबा मंदिर में श्रावण मास की दूसरी सोमवारी पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है। प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण यह स्थल झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा के श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र है।

महंत केशवानंद सरस्वती

क्या है जयदा मंदिर का ऐतिहासिक गौरव?
महंत केशवानंद सरस्वती ने बताया यह मंदिर 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच भोगुल्ल पुत्र दामप्प द्वारा निर्मित बताया जाता है। 18वीं और 19वीं सदी में यह स्थल केरा (खरसावां) के महाराज और ईचागढ़ के राजा विक्रमादित्य देव के संरक्षण में पुनः जागृत हुआ। महंत केशवानंद सरस्वती के अनुसार पंचदशनाम जूना अखाड़ा के संतों को यहाँ दिव्य अनुभूति हुई, जिसके बाद मंदिर पुनर्निर्माण का कार्य 1971 में प्रारंभ हुआ।

मंदिर तक पहुंचने में आसान दूरी
टाटा-रांची मुख्य मार्ग NH-33 से मात्र 2 किमी अंदर स्थित यह मंदिर जमशेदपुर से 35 किमी, रांची से 100 किमी और पश्चिम बंगाल के पुरुलिया से 65 किमी की दूरी पर है। देवों के देव महादेव की उपस्थिति के कारण यह स्थल भक्तों को सहज ही आकर्षित करता है।

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प्रशासन अलर्ट: सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम
श्रावणी सोमवार को मंदिर में श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने सख्त सुरक्षा व्यवस्था की है। चांडिल अनुमंडल पदाधिकारी के निर्देश पर मंदिर परिसर में प्रशिक्षित 5 लाइफ गार्ड, गोताखोर और नाव की व्यवस्था की गई है।

जल स्तर बढ़ने से खतरे की आशंका
हाल की भारी वर्षा और चांडिल डैम के 10 रेडियल गेट खुलने के कारण सुवर्णरेखा नदी का जल स्तर काफी बढ़ गया है। मंदिर की सीढ़ियाँ जलमग्न हैं और जलधारा तेज़ है। चूंकि मंदिर परिसर में जल भराव का केवल एक ही स्थान है, इसलिए किसी भी अप्रिय घटना की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

कावड़ियों की आस्था का प्रमुख पड़ाव
श्रावण मास के दौरान कावड़िए नदी स्नान के पश्चात जल भरकर “बोल बम” के जयघोष के साथ शिवलिंग पर जलार्पण करते हैं। इसके अतिरिक्त दलमा सेंचुरी के दलमा बूढ़ा बाबा मंदिर (35 किमी) और पुरुलिया के बड़ेदा शिव मंदिर (42 किमी) तक की कठिन यात्रा भी श्रद्धालु तय करते हैं।

जयदा मंदिर न केवल आस्था का केन्द्र है बल्कि यह सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक समृद्धि का संगम भी है। यहां श्रद्धा, इतिहास और पर्यावरण तीनों मिलकर एक दिव्य ऊर्जा का संचार करते हैं।

 

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