गुवा: सारंडा वन क्षेत्र को सेंचुरी घोषित करने की योजना को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध तेज हो गया है। आगामी 8 अक्टूबर को इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने वाली है, जिसके पहले छोटानगरा और रोवांम में ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन किया।
पूर्व सांसद गीता कोड़ा ने कहा कि झारखंड की मौजूदा सरकार ने इस विषय पर अब तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि हेमंत सरकार कान में तेल डालकर सोई हुई है, जबकि प्रशासनिक स्तर पर यह माहौल बनाया जा रहा है कि सारंडा को बचाने का एकमात्र तरीका उसे सेंचुरी घोषित करना है।
गीता कोड़ा ने कहा कि सारंडा क्षेत्र के आदिवासी ग्रामीणों को गुमराह किया जा रहा है। सरकार को चाहिए कि वे उनके रोजगार और आजीविका के विकल्पों पर पहले ध्यान दे। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण जरूरी है, लेकिन ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे आदिवासी समाज के हितों को नुकसान पहुँचे।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब खड़काई बांध या इचाडैम जैसी परियोजनाओं पर निर्णय लिए जाते हैं, तो उस वक्त ग्रामीणों की राय क्यों नहीं ली जाती? उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसे मामलों में जनमत और स्थानीय सहमति को प्राथमिकता देनी चाहिए।
गीता कोड़ा ने कहा कि अगर सारंडा के साल वन, पहाड़ और प्राकृतिक झरनों को सही तरीके से संरक्षित किया जाए, तो यह इलाका देश-विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है। उन्होंने सरकार से अपील की कि विकास और संरक्षण दोनों का संतुलन बनाया जाए।


















































