सरायकेला: झारखंड, बंगाल, ओडिशा और असम के कई हिस्सों में नाग पंचमी के अवसर पर मनसा देवी पूजा पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाई जा रही है। 2025 में प्रमुख पूजा तिथि 29 जुलाई रही, लेकिन यह पूजा क्षेत्रीय परंपरा अनुसार 30 जून, 15 जुलाई, 13 अगस्त जैसे अन्य दिनों में भी की जाती है।
मनसा देवी को नागों की देवी माना जाता है और लोक मान्यता के अनुसार वे भगवान शिव की पुत्री हैं। कई इलाकों में यह पूजा श्रावण से लेकर आश्विन महीने तक चलती है, जिसमें श्रद्धालु नागों को पूजते हैं।
बतख की बलि और व्यापार: श्रद्धा के साथ रोजगार भी
मनसा पूजा के दौरान देवी को बतख या हंस की बलि दी जाती है। इसी के साथ इस पूजा के दौरान बतख कारोबारियों की आमदनी भी तेजी से बढ़ जाती है।
सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ गांव में रहने वाले बीरबल खान ने 8 साल पहले सिर्फ 1000 बतखों से शुरुआत की थी। आज वे 2,000 से 3,000 बतखों का पालन कर रहे हैं, जिनकी देखभाल के लिए उन्होंने 6 लोगों को नौकरी पर रखा है।
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एक बतख की कीमत 400 रुपये तक, खास डिमांड मनसा पूजा में
इन बतखों का वजन लगभग 1.2 से 1.8 किलोग्राम होता है। सामान्य दिनों में एक बतख की कीमत 100-200 रुपये होती है, लेकिन मनसा पूजा के समय यह बढ़कर 300-400 रुपये तक पहुंच जाती है।
बीरबल खान बताते हैं कि इन बतखों को आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश (बनारस) से मंगाया जाता है। स्थानीय हॉकर और व्यापारी इन्हें आसपास के बाजारों में बेचते हैं, जिससे पूजा के समय भारी मांग और मुनाफा होता है।

परंपरा से जुड़ी लोककथा
किंवदंती के अनुसार, मनसा देवी ने देवताओं में स्थान पाने के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की थी। शिव ने कहा कि यदि अंग देश के एक व्यापारी ‘चाँद’ उनकी पूजा करें, तो उनकी मान्यता बढ़ जाएगी।
लेकिन चाँद ने पूजा करने से मना कर दिया, जिससे उसे बड़ा नुकसान हुआ—वह कंगाल हो गया और उसके बेटे सर्पदंश से मारे गए। आख़िरकार बहू के आग्रह पर व्यापारी ने मनसा देवी की पूजा की, और उसकी किस्मत फिर से बदल गई। तभी से मनसा देवी पूजा की परंपरा शुरू मानी जाती है।
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