जमशेदपुर : समाजवादी चिंतक एवं अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य तीन वर्ष की वकालत की शर्त को घटाकर एक वर्ष कर दिया है, साथ ही चयनित उम्मीदवारों को एक साल की ट्रेनिंग और एक साल की क्लर्कशिप से गुजरना होगा। सुधीर कुमार पप्पू ने बताया कि मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति अगस्त जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला “भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ” व संबंधित याचिकाओं पर शुक्रवार को सुनाया है। इस फैसले के अनुसार 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी परीक्षा अधिसूचनाओं वाले संक्रमण काल के उम्मीदवार अब बिना पूर्व अनुभव के भी पात्र होंगे, लेकिन चयन के बाद उन्हें एक वर्ष के लिए प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी बनाया जाएगा, राज्य न्यायिक अकादमी में एक वर्ष की गहन ट्रेनिंग करनी होगी (जो तीन वर्ष की शर्त के लिए एक वर्ष वकालत के बराबर मानी जाएगी), और फिर एक वर्ष की संरचित क्लर्कशिप करनी होगी पहले छह महीने प्रधान जिला न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा के सदस्य की देखरेख में, शेष छह महीने संबंधित हाईकोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश की देखरेख में, जिसके बाद संतोषजनक मूल्यांकन रिपोर्ट पर नियमित नियुक्ति और वेतनमान मिलेगा। वहीं 1 अप्रैल 2027 के बाद जारी अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवारों के पास कम से कम एक वर्ष का सत्यापित सक्रिय वकालत अनुभव अनिवार्य होगा, और चयन के बाद उसी तरह एक वर्ष की अकादमी ट्रेनिंग व छह-छह महीने की दो-चरणीय क्लर्कशिप से गुजरना होगा, जिसमें ट्रेनिंग के दौरान उन्हें प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सकल वेतन का आधा हिस्सा मिलेगा।
सुधीर कुमार पप्पू के अनुसार, वकालत के अनुभव की अनिवार्यता के चलते मेधावी लॉ ग्रेजुएट्स ग्रेजुएशन के तुरंत बाद न्यायपालिका जॉइन करने से हतोत्साहित हो सकते थे, जिसका अब समाधान हो गया है।
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