Jamshedpur : पंचायती ढांचे के बिना पेसा कानून निष्प्रभावी – जेपी पांडेय

  • भाजपा किसान मोर्चा के नेता ने कहाग्राम सभा को केंद्र में रखे बिना आदिवासी स्वशासन का सपना अधूरा

जमशेदपुर : झारखंड में लागू पेसा (पंचायत विस्तार अनुसूचित क्षेत्र) कानून को लेकर भाजपा किसान मोर्चा झारखंड प्रदेश के नेता एवं हिंदू धर्म रक्षा मंच के प्रदेश मंत्री जय प्रकाश पांडेय ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि जब तक राज्य में पंचायती ढांचे को मजबूती नहीं दी जाती, तब तक पेसा कानून केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा। पांडेय ने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन सरकार के कार्यकाल में पंचायतें लगभग निष्क्रिय अवस्था में हैं। पंचायत प्रतिनिधि विकास कार्यों की जगह जन्म प्रमाण पत्र और अन्य औपचारिक कार्यों में उलझे हुए हैं, जबकि सरकार पेसा कानून लागू करने का श्रेय ले रही है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।

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झारखंड में पंचायतों की निष्क्रियता पर उठे सवाल

जेपी पांडेय ने स्पष्ट किया कि आम धारणा के विपरीत पेसा कानून का पंचायती राज व्यवस्था से गहरा संबंध है। यह मानना गलत है कि पेसा कानून का पंचायतों से कोई लेना-देना नहीं है। वास्तव में यह कानून संविधान के 73वें संशोधन से जन्मी पंचायती राज प्रणाली पर ही आधारित है। ग्राम सभा से लेकर ग्राम पंचायत और जिला परिषद तक की श्रृंखला के बिना पेसा कानून केवल किताबों में दर्ज कुछ पंक्तियों के समान रह जाता है। संविधान के 73वें संशोधन के तहत त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को स्थानीय स्वशासन का दर्जा दिया गया और 11वीं अनुसूची में कृषि, जल, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण सड़क, गरीबी उन्मूलन जैसी अहम जिम्मेदारियां पंचायतों को सौंपी गईं।

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73वें संविधान संशोधन और पेसा कानून का आपसी संबंध

उन्होंने बताया कि अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी स्वशासन की परंपरा को देखते हुए इन प्रावधानों को सीधे लागू नहीं किया गया, बल्कि भूरिया समिति की सिफारिशों के आधार पर अलग कानून बनाया गया, जिसे आज पेसा कानून के रूप में जाना जाता है। भूरिया समिति के अनुसार लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि आदिवासी समुदाय के लिए शासन की भागीदारी है। इसी सोच के तहत ग्राम सभा को स्थानीय स्वशासन की मूल इकाई माना गया। पेसा कानून की धारा 4 को इसकी आत्मा बताते हुए पांडेय ने कहा कि यह ग्राम सभा को सशक्त बनाने की बात करती है, ताकि विकास योजनाओं, लाभार्थियों के चयन और संसाधनों के उपयोग पर अंतिम निर्णय स्थानीय स्तर पर हो सके।

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भूरिया समिति और ग्राम सभा की भूमिका

जेपी पांडेय ने यह भी कहा कि पेसा कानून के तहत ग्राम सभा को भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, सहकारी समितियों और विकास परियोजनाओं पर निगरानी का अधिकार दिया गया है। इसके साथ ही लघु वन उपज, ग्राम हाट-बाजार, लघु खनिज, जल स्रोत और गांव में शराब बिक्री जैसे विषयों पर भी ग्राम सभा और पंचायतों को अधिकार प्राप्त हैं। लेकिन व्यवहारिक सच्चाई यह है कि ग्राम सभा के पास न तो बजट जारी करने की शक्ति है और न ही प्रशासनिक अधिकार। ये सभी कार्य पंचायत और जिला परिषद के माध्यम से ही संभव हैं, जिससे साफ होता है कि पंचायती ढांचे के बिना पेसा कानून प्रभावी नहीं हो सकता।

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पेसा कानून के अधिकार और जमीनी चुनौतियां

अपने बयान के अंत में जय प्रकाश पांडेय ने कहा कि पेसा कानून को नए लोकतांत्रिक शासन की बुनियाद कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह कानून केवल आदिवासियों के लिए नहीं, बल्कि अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले सभी निवासियों के अधिकारों की रक्षा करता है, हालांकि प्राथमिकता उन समुदायों को देता है जिनकी जमीन, जंगल और संस्कृति सदियों से हाशिए पर रही है। उन्होंने ग्राम सभा को आत्मा, पंचायतों को शरीर और जिला परिषद को मस्तिष्क की संज्ञा देते हुए कहा कि जब तक तीनों में तालमेल नहीं होगा, तब तक स्वशासन का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। समाधान यही है कि पंचायती राज ढांचे के अंतर्गत ग्राम सभा को सर्वोच्च संस्था मानकर उसके निर्णयों को बाध्यकारी बनाया जाए।

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