Jamshedpur : यूजीसी बिल पर हाय तौबा क्यों, कुलबिंदर सिंह ने उठाया सवाल

  • जातिगत भेदभाव रोकने और समानता सुनिश्चित करने के लिए यूजीसी बिल अहम कदम
  • कुलबिंदर सिंह ने उठाए स्वर्ण जाति विरोधियों पर सवाल

जमशेदपुर : पूर्व कार्यकारी प्रधानाध्यापक एवं अधिवक्ता कुलबिंदर सिंह ने यूजीसी बिल के प्रावधान और समता कमेटी को लेकर हाय तौबा करने वालों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि क्या इन्हें देश के संविधान और न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं है? कुलबिंदर सिंह के अनुसार स्वर्ण जाति के लोग इस धारणा को मजबूत करना चाहते हैं कि देश के भौतिक संसाधन, रोज़गार और शिक्षा पर अगड़ी जातियों का कब्जा है। उनका कहना है कि ऐसे लोग अन्य भारतीयों को अपने समकक्ष खड़ा होने की अनुमति नहीं देना चाहते और बिल का विरोध करके यह दिखा रहे हैं कि वे रूढ़िवादी मानसिकता के हैं।

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केंद्र सरकार और यूजीसी का उद्देश्य पिछड़े वर्ग के अधिकारों की रक्षा

कुलबिंदर सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार और यूजीसी ने अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के हित में यह कदम उठाया है। उन्होंने ईडब्ल्यूसी (EWS) के तहत अगड़ी जातियों को 10% आरक्षण देने की तुलना करते हुए कहा कि समानता कमेटी का उद्देश्य शिक्षा और रोजगार में न्याय सुनिश्चित करना है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला दिया, जिसमें एनसीआरबी के आंकड़े और नेशनल टास्क फोर्स की सिफारिश के आधार पर समता कमेटी को प्रभावी बनाने का निर्देश दिया गया।

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केंद्र सरकार और यूजीसी की न्यायसंगत पहल

कुलबिंदर सिंह ने चेताया कि 2014 से 2021 तक आईआईटी, आईआईएम और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलुरु जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों ने जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के कारण आत्महत्या की। केंद्रीय विश्वविद्यालय में 37 और एनआईटी में 30 बच्चों ने इसी कारण अपने जीवन का अंत किया। उन्होंने कहा कि इस बिल के विरोध की बजाय उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों को जातिगत उत्पीड़न से बचाने की जिम्मेदारी अभिभावकों और समाज की है।

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यूजीसी बिल: न्याय और समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

कुलबिंदर सिंह ने कहा कि अगड़ी जातियों के बच्चों के पास सदियों से शील, परोपकार और सहअस्तित्व की परंपरा है। उन्हें इस पर चलने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए न कि विरोध में आग में पेट्रोल डालने जैसा कार्य करना चाहिए। भारत में जातिगत उत्पीड़न यथार्थ है और यह ऐतिहासिक व सामाजिक सत्य है। यूजीसी की समता कमेटी 24 घंटे के अंदर शिकायत की बैठक करेगी, 15 दिन में रिपोर्ट तैयार करेगी और सात दिन के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित करेगी। यह बिल शोषित वर्ग को न्याय और अवसर देने की दिशा में एक सराहनीय कदम है।

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