West Bengal: झाड़ग्राम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ऐतिहासिक रैली, बंगाली भाषा और अस्मिता के सम्मान में उमड़ा जनसैलाब

झाड़ग्राम: बंगाली भाषा और संस्कृति के अपमान के विरोध में बुधवार को झाड़ग्राम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक रैली आयोजित हुई। यह रैली न सिर्फ भीड़ के लिहाज़ से बड़ी थी, बल्कि अपने प्रतीकों और संदेशों के चलते बंगाली अस्मिता के एक नए अध्याय के रूप में दर्ज हो गई।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी झाड़ग्राम के शारदापीठ चौराहे से पंचमाथा चौराहे तक लगभग तीन किलोमीटर की पदयात्रा की अगुवाई कर रही थीं। उनके एक हाथ में आदिवासी नायक बिरसा मुंडा की तस्वीर थी, तो दूसरे हाथ में कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर की। यह दृश्य खुद में एक गहरी सांस्कृतिक और वैचारिक घोषणा थी — एक ओर आदिवासी संघर्ष का प्रतीक, तो दूसरी ओर बंगाली संस्कृति की पहचान।

रैली में हजारों की संख्या में लोगों ने भाग लिया। आम जनता के साथ-साथ झाड़ग्राम शारदापीठ कन्या गुरुकुल की साध्वियां, रामकृष्ण मिशन के महाराज, और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधि भी इस सांस्कृतिक मार्च में शामिल हुए। जनसमूह में कई लोगों के हाथों में बांग्ला साहित्य और इतिहास के प्रमुख विद्वानों के चित्र थे, जो इस मार्च को एक सांस्कृतिक आंदोलन का रूप दे रहे थे।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ इस मार्च में राज्य सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री और नेता मौजूद थे। इनमें अरूप विश्वास, फिरहाद हकीम, इंद्रनील सेन, डॉ. मानस भुइयां, बीरबाहा हांसदा, श्रीकांत महतो, सांसद कालीपद सोरेन, पूर्व सांसद डॉ. उमा सोरेन, विधायक दुलाल मुर्मू, देवनाथ हांसदा और जिला परिषद अध्यक्ष चिन्मयी मरांडी जैसे नाम प्रमुख रहे।

मार्च के दौरान झाड़ग्राम शहर के दोनों ओर हजारों लोग खड़े होकर मुख्यमंत्री का अभिवादन कर रहे थे और जय बांग्ला के नारे गूंज रहे थे। मुख्यमंत्री भी बार-बार रुककर आम जनता से बात करती रहीं। यह दृश्य राजनीतिक से अधिक एक मानवीय संवाद जैसा लग रहा था, जिसमें एक जननेता सीधे लोगों के साथ अपनी भावनाएं साझा कर रही थीं।

मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर कहा, “झाड़ग्राम शहर ने पहले कभी इतना बड़ा मार्च नहीं देखा। यह भाषा और संस्कृति की ताकत है।” यह बयान इस बात को और गहराता है कि यह मार्च केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि बंगाल की संस्कृति और आत्मसम्मान की सार्वजनिक घोषणा थी।

यह दिन झाड़ग्राम के इतिहास में दर्ज हो गया — न सिर्फ भीड़ के लिए, बल्कि इस बात के लिए कि एक पूरी संस्कृति ने मिलकर अपनी आवाज़ बुलंद की, अपने अस्तित्व के प्रति सम्मान जताया और यह साफ किया कि बंगाली भाषा या पहचान को किसी भी हाल में अपमानित नहीं होने दिया जाएगा।

 

 

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