Jamshedpur : भारतीय अर्थव्यवस्था के समृद्धि में चरवाहों का अनोखा सहयोग – जे पी पांडेय

  • अंतरराष्ट्रीय चरवाहा वर्ष 2026 के बहाने नीति, सम्मान और विकास पर नई बहस

जमशेदपुर : भाजपा किसान मोर्चा झारखंड प्रदेश के नेता एवं झारखंड राज्य समाज कल्याण आंगनवाड़ी कर्मचारी संघ के संयोजक जय प्रकाश पांडेय ने अंतरराष्ट्रीय चरवाहा वर्ष 2026 के संदर्भ में भारतीय अर्थव्यवस्था में चरवाहा समुदाय की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया की एक बड़ी आर्थिक शक्ति आज भी “अनदेखी अर्थव्यवस्था” के रूप में चरवाहों के श्रम और ज्ञान पर टिकी है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2026 को अंतरराष्ट्रीय चरवाहा वर्ष घोषित करना इस वैश्विक सच्चाई की आधिकारिक स्वीकारोक्ति है कि भेड़, बकरी, गाय, भैंस, ऊंट, याक जैसे पशुओं का पालन करने वाले चरवाहे किसी न किसी रूप में अर्थव्यवस्था के मजबूत स्तंभ हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, और इसमें चरवाहा समुदाय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद, नीतिगत स्तर पर इस समुदाय की अनदेखी लंबे समय से जारी है, जबकि ये पशुपालक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था को मेरुदंड की तरह सहारा दे रहे हैं।

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अंतरराष्ट्रीय चरवाहा वर्ष 2026 का वैश्विक महत्व

जय प्रकाश पांडेय ने बताया कि भारत के राजस्थान, गुजरात, हिमालयी क्षेत्र, लद्दाख, बुंदेलखंड, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में चरवाहों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, लेकिन सभी का योगदान समान रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में है। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है और दूध, दही, घी, ऊन, मांस, चमड़ा जैसे उत्पादों का स्रोत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चरवाहा समुदाय ही है। कृषि के बाद पशुपालन को ग्रामीण आय का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। सूखा, बाढ़ या फसल नुकसान जैसी आपदाओं में पशुधन ही ग्रामीण परिवारों के लिए आर्थिक कवच बनता है। इतना ही नहीं, चरवाहे चारागाह प्रबंधन, बीजों के प्रसार, मिट्टी के संरक्षण और जैव विविधता को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं, जो सतत विकास की बुनियाद है।

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ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन की बढ़ती भूमिका

पांडेय ने चिंता जताई कि सरकारों की नीतिगत उपेक्षा और इच्छाशक्ति के अभाव के कारण चरागाहों का लगातार संकुचन हो रहा है। वन कानूनों की कठोर व्याख्या, खनन और औद्योगिक परियोजनाएं, हाईवे-रेलवे विस्तार और तेज शहरीकरण ने पशुओं के पारंपरिक चराई मार्गों को तोड़ दिया है। जबकि ऐतिहासिक रूप से भारत में वन और चरवाहा समुदाय के बीच टकराव नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व रहा है। नियमित चराई से जंगलों में आग की घटनाएं कम होती हैं, झाड़ियों का संतुलन बना रहता है और घास के मैदान स्वस्थ रहते हैं। इसके बावजूद, जब सामुदायिक अधिकारों की बात आती है, तो चरवाहा समुदाय को उसी तरह नजरअंदाज किया जाता है, जैसे दशकों तक आंगनवाड़ी कर्मियों को अधिकारों से वंचित रखा गया। इस अस्पष्टता के कारण प्रशासनिक दमन और सामाजिक संघर्ष बढ़ रहा है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी चुनौती है।

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चरागाह संकट और वन-चरवाहा सह-अस्तित्व

जलवायु परिवर्तन के दौर में चरवाहों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है, लेकिन चराई प्रतिबंध, सीमाएं और वैकल्पिक रोजगार के खोखले वादे इस परंपरागत जीविका को कमजोर कर रहे हैं। नतीजतन, युवा पीढ़ी या तो पलायन कर रही है या अपनी परंपरा से कटती जा रही है। चरवाहा समुदाय सामाजिक सम्मान और पहचान के संकट से जूझ रहा है, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा तक उनकी पहुंच सीमित है। महिलाओं की भूमिका, जो पशुपालन की रीढ़ हैं, आज भी अदृश्य बनी हुई है। पांडेय ने सुझाव दिया कि यदि युवाओं को तकनीक से जोड़ा जाए तो डेयरी नवाचार, दूध आधारित उद्योग, ऊंट पर्यटन, सजावटी उत्पाद जैसे नए अवसर पैदा हो सकते हैं। मोबाइल, इंटरनेट और ऐप्स के जरिए बीमा, मौसम पूर्वानुमान, टेलीमेडिसिन और मार्केटिंग को बढ़ावा दिया जा सकता है। 2026 अंतरराष्ट्रीय चरवाहा वर्ष भारत के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है कि केंद्र और राज्य सरकारें चरवाहा-केंद्रित नीति ढांचा विकसित करें, कानूनी पहचान दें और उनके पारंपरिक ज्ञान को नीति निर्माण में शामिल करें। यही भविष्य की कुंजी है, जहां विकास प्रकृति से टकराव नहीं, बल्कि उसके साथ साझेदारी बने।

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