- रुआम गांव के कुलगोंडा टोला में सबर जनजाति की बदहाली, सरकारी दावों की खुली पोल
- इलाज और आवास के अभाव में सबर परिवारों पर मंडरा रहा खतरा
जादूगोड़ा : मुसाबनी प्रखंड अंतर्गत रुआम गांव के कुलगोंडा टोला में रहने वाले 13 सबर परिवार झारखंड अलग राज्य बने 25 साल बीत जाने के बाद भी बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं। विलुप्त होती सबर जनजाति के उत्थान के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। इन परिवारों को 30 साल पहले इंदिरा आवास योजना के तहत जो मकान मिले थे, वे अब पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं। छतें कभी भी गिर सकती हैं, दरवाजे तक नहीं हैं और बरसात में घरों के अंदर पानी टपकता है। ठंड के मौसम में बिना दरवाजे के रातें गुजारना इन परिवारों की मजबूरी बन चुकी है।
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सरकारी योजनाओं के बावजूद आदिम जनजाति की बदहाल स्थिति
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कुलगोंडा टोला की उर्मिला सबर, प्रिया सबर, पुष्पावती सबर, टकलू सबर, पुटू सबर, तुलसी सबर, मनीषा सबर सहित अन्य लोगों का कहना है कि आवास के साथ-साथ उन्हें पेयजल की भी गंभीर समस्या झेलनी पड़ रही है। टोले के आसपास लगे अधिकांश चापाकल खराब पड़े हैं, जिससे उन्हें दूर-दराज से पानी लाना पड़ता है। हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की ओर से सीएसआर योजना के तहत गांव को पानी टंकी दी गई है, लेकिन सबर परिवारों का आरोप है कि ग्रामीण उन्हें उस टंकी से पानी लेने नहीं देते। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि मोटर खराब होने पर मरम्मत का खर्च सबर परिवार नहीं उठा पाते। इस कारण सबर परिवार पानी के अधिकार से वंचित हैं और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।
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पानी के लिए तरसते सबर परिवार, सामाजिक भेदभाव का आरोप
ग्रामीण विश्वनाथ महतो, सपन हलधर और अमूल्य महतो बताते हैं कि ये 13 सबर परिवार आज भी आदिम युग जैसी जिंदगी जीने को विवश हैं। ठंड खत्म होने को है, लेकिन इन्हें सरकारी कंबल तक नसीब नहीं हुआ। इसी टोले के सोनू सबर गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। उनके हाथ का घाव अब बड़ा और खतरनाक रूप ले चुका है, लेकिन इलाज के अभाव में स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर भी घाव देखकर लौटा देते हैं, जिससे उनकी जान पर खतरा मंडरा रहा है। ग्रामीणों ने झारखंड सरकार से जर्जर आवासों के बदले नए पक्के मकान, इलाज और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है। सवाल यह है कि प्रखंड के जिम्मेदार अधिकारी कब इन परिवारों की सुध लेंगे, कहीं किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन की नींद न टूटे।