रामगढ़: मांडू प्रखंड के गोबिंदपुर गाँव में बासदैव गंझु नाम के आदिवासी किसान की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणादायक है। लॉकडाउन के दौरान जब मजदूरी का काम बंद हो गया और परिवार का पेट चलाना मुश्किल हो गया, तब बासदैव ने हार मानने की बजाय कदम बढ़ाया। अपने बच्चों को भूख से तड़पते देखकर उन्होंने अपने पूर्वजों की बंजर पड़ी जमीन में कुदाल चलाना शुरू किया।
शुरुआत में उन्होंने केवल एक एकड़ जमीन में ताजी सब्ज़ियाँ उगाकर परिवार का पेट भरा। धीरे-धीरे मेहनत और धैर्य से लगभग दस एकड़ बंजर जमीन को हरा-भरा खेत बना दिया। आज इस जमीन से वे बैंगन, टमाटर, गोभी, मिर्च, खीरा, करेला और कई हरी सब्जियाँ उगा कर मासिक लाखों रुपये कमा रहे हैं।
बासदैव गंझु कहते हैं “जब लॉकडाउन में हम बेरोजगार हो गए थे और खाने-पीने की परेशानी थी, तो हमने सोचा कि इस बंजर जमीन में कुछ किया जाए। मेहनत और धैर्य से हमने इसे खेती योग्य बना लिया। अगर सरकार हमें थोड़ी मदद दे, तो हम और दस-बीस एकड़ बंजर जमीन को उपजाऊ बना कर व्यवसाय बढ़ा सकते हैं।”
पड़ोसी शहीद सिद्दीकी बताते हैं कि बासदैव की यह सफलता उनके और परिवार की मेहनत का परिणाम है। पूरे मांडू प्रखंड के लोग उनकी मेहनत और जिजीविषा की तारीफ कर रहे हैं। शहीद कहते हैं कि यदि सरकार थोड़ी मदद करे, तो बासदैव और बड़े पैमाने पर खेती कर सकते हैं।
जहां केंद्र और राज्य सरकार किसानों के लिए कई योजनाएं चला रही हैं, वहीं बासदैव जैसे किसान आज भी सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मेहनती किसानों को चिन्हित कर योजनाओं का लाभ सीधे धरातल पर पहुंचाना बेहद जरूरी है। तभी बासदैव जैसी मेहनत करने वाली आत्माओं को आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।
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