- सेवा और समर्पण के लिए झारखंड में बीता जीवन
जमशेदपुर : 87 साल पहले 1939 में कर्नाटक के मंगलौर जिले के मुराईकोडी गांव में कृषक परिवार लाजरस फर्नांडीज एवं कार्मीन लोबो के घर जन्मे फादर कामिल रत्नाकर प्रभु का जीवन झारखंड और इसके लोगों के उत्थान के लिए समर्पित रहा। 57 वर्षों तक उन्होंने शिक्षा, सामाजिक सेवा और सामुदायिक विकास में अपना योगदान दिया। उनका अरमान था कि सेवा और समर्पित जीवन का आखिरी दम भी झारखंड में ही निकले। फादर प्रभु ने सेंट जोसेफ मिडिल एवं हाई स्कूल गोलमुरी, सेंट जेवियर मिडिल एवं हाई स्कूल चाईबासा, कौशल विकास केंद्र सुंदरनगर, कैथोलिक चैरिटी और विकास भारती जैसी संस्थाओं की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।
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शिक्षा और समाज सेवा में योगदान
फादर सी आर प्रभु अपने पुरोहित जीवन को मानवता और धर्म के प्रति समर्पित मानते हैं। उन्हें अपने गांव के चर्च के अंग्रेज पुरोहित फादर ग्रेगरी डिक्रूज और पारिवारिक धार्मिक परिवेश से प्रेरणा मिली। 1966 में पुरोहित बनने के बाद उन्होंने 1969 में जमशेदपुर आकर गोलमुरी गिरजाघर के पहले हिंदुस्तानी पुरोहित के रूप में सेवा प्रारंभ की। उन्होंने धर्मशास्त्र पढ़ाया, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण पर जोर दिया और सरकार की योजनाओं को मूर्त रूप देने में सक्रिय योगदान दिया। फादर प्रभु ने समाज में सहकारिता और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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साहित्यिक एवं स्वास्थ्य योगदान
फादर प्रभु ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आठ पुस्तकें लिखी हैं और पिछले एक साल से संत जोसेफ अस्पताल भिलाईपहाड़ी में स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। इसके बावजूद उनकी पूरी एकाग्रता “स्पिरिट फील्ड जर्नी ऑफ लाइफ़” पुस्तक को पूरा करने में है। उन्होंने शिक्षा, सामाजिक संस्थाओं और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में झारखंड को कई प्रेरणास्रोत प्रदान किए हैं। उनका जीवन स्थानीय लोगों के लिए अनुकरणीय उदाहरण है कि सेवा, शिक्षा और धर्म को मिलाकर कैसे समाज का सर्वांगीण विकास किया जा सकता है।






















































