Saraikela: सिदो-कान्हू जयंती पर चंपई सोरेन ने धर्मांतरण के खिलाफ ‘उलगुलान’ का दिया नारा, आरक्षण नीति पर भी उठाए सवाल

सरायकेला: सरायकेला जिला अंतर्गत राजनगर प्रखंड के गामदेसाई फुटबॉल मैदान में आदिवासी सावता सुसार अखाड़ा की ओर से झारखंड के वीर शहीद सिदो-कान्हू की जयंती हर्षोल्लास और आत्मगौरव के साथ मनाई गई. कार्यक्रम की शुरुआत राजनगर चौक स्थित सिदो-कान्हू की प्रतिमा पर पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन द्वारा माल्यार्पण से हुई. इसके बाद पारंपरिक ढोल-नगाड़ों के साथ जनसमूह कार्यक्रम स्थल की ओर रवाना हुआ.

परंपरा, पहचान और पुनर्जागरण का स्वर

कार्यक्रम का शुभारंभ देश परगना और विभिन्न माझी-परगनाओं द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ. इस दौरान वक्ताओं ने धर्मांतरण को आदिवासी समाज के अस्तित्व के लिए घातक बताते हुए चिंता जताई. सभी वक्ता मंच पर एक स्वर में आदिवासी संस्कृति, अधिकार और परंपराओं की रक्षा के लिए एकजुट नजर आए.

‘यदि अब नहीं जागे, तो परंपरा और पहचान समाप्त हो जाएगी’ – चंपई सोरेन

पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा कि झारखंड में आदिवासी अब अल्पसंख्यक हो गए हैं और इसका मुख्य कारण तीव्र धर्मांतरण है. उन्होंने इसके लिए कांग्रेस पार्टी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया. साथ ही उन्होंने मौजूदा राज्य सरकार पर भी कांग्रेस गठबंधन के कारण आदिवासी हितों की उपेक्षा का आरोप लगाया.

धर्मांतरण और आरक्षण को लेकर कड़ा रुख

चंपई सोरेन ने मंच से स्पष्ट किया कि उन्हें किसी अन्य धर्म या संप्रदाय से द्वेष नहीं है, लेकिन जो लोग धर्मांतरण कर चुके हैं, उन्हें आदिवासी आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए. उन्होंने यह भी चेताया कि यदि समय रहते आदिवासी समाज नहीं जागा, तो जाहेर थान, सरना स्थल और देशउलि जैसे धार्मिक प्रतीक विलुप्त हो जाएंगे.

‘कोल्हान से फिर गूंजे उलगुलान’

अपने संबोधन में चंपई ने कहा, “जिस तरह कोल्हान के जंगलों से अलग झारखंड राज्य की डुगडुगी बजी थी, अब उसी तरह धर्मांतरण और घुसपैठ के विरुद्ध भी उलगुलान करना होगा.” उन्होंने यह भी कहा कि यदि हमारे आरक्षण और हक पर कोई हमला करेगा, तो आदिवासी समाज उसे माफ नहीं करेगा. इस मौके पर भारी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हुए. आयोजन को सफल बनाने में फनी भूषण दास, बबलू दास, पतित पावन दास सहित समस्त ग्रामीणों व युवाओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई.

 

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