झारखंड मुक्ति मोर्चा भी विपक्षी दलों के साथ
नई दिल्ली : बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर उठे विवाद ने अब राष्ट्रीय बहस का रूप ले लिया है। विपक्ष जहां इसे दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और गरीबों के मताधिकार पर सुनियोजित हमला बता रहा है, वहीं अब यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े तक पहुंच गया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर देशभर में हर चुनाव से पहले मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) कराने की मांग की गई है। दूसरी ओर इस मामले की खिलाफत में कई अन्य दल भी शामिल हो गए हैं. जिसमें कांग्रेस, शरद पवार की एनसीपी, शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), समाजवादी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, CPI और CPI (ML) समेत कई विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव आयोग द्वारा बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा को चुनौती दी है और सुप्रीम कोर्ट में इसे रद्द करने की मांग की है।
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बिहार की स्थिति पर विशेष ज़ोर
बिहार की 243 विधानसभा सीटों में हर क्षेत्र में अनुमानत 8,000-10,000 अवैध, डुप्लिकेट या फर्जी नाम वोटर लिस्ट में शामिल हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि यदि सिर्फ 2,000-3,000 वोटों का अंतर हो तो वह चुनाव परिणाम को पूरी तरह पलट सकता है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार में SIR के खिलाफ दायर याचिकाओं के एक समूह को 10 जुलाई को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने अश्विनी उपाध्याय से प्रक्रिया संबंधी कमियों को दूर करने को कहा ताकि उनकी याचिका भी उसी दिन सुनी जा सके।
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