Jhargram : जंगमहल की आत्मा है टुसू पर्व, कृषि संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक

  • मकर संक्रांति पर गीत, स्नान, मेला और विसर्जन के साथ जीवंत होती परंपरा
  • कृषि से जुड़ा प्राचीन पर्व, कार्तिक से पौष तक की परंपरा

झाड़ग्राम : मकर पर्व या टुसू पर्व जंगमहल क्षेत्र का केवल एक पारंपरिक उत्सव नहीं, बल्कि यहां के लोगों के जीवन संघर्ष, कृषि आधारित संस्कृति और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है। टुसू एक प्राचीन कृषि पर्व है, जिसकी शुरुआत धान की फसल से जुड़ी हुई है। कार्तिक माह से धान की कटाई आरंभ होती है और अग्रहायण संक्रांति के दिन यह कार्य पूर्ण होता है। इस दिन को स्थानीय भाषा में “छोटा मकर” कहा जाता है। इसी अवसर पर खेतों से धान की बालियों के गुच्छे घर लाए जाते हैं, जिन्हें कूड़माली भाषा में ‘डिनिमांज’ कहा जाता है। इसी परंपरा के साथ टुसू पर्व की विधिवत शुरुआत होती है और गांवों में उत्सव का माहौल बन जाता है।

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गीत, स्नान और टुसू विसर्जन के साथ उत्सव का चरम

अग्रहायण संक्रांति से लेकर पौष संक्रांति तक लगभग एक महीने तक गांव-गांव में टुसू गीतों की गूंज सुनाई देती है। मकर संक्रांति के दिन लोग नदी और तालाबों में मकर स्नान करते हैं, जिसके बाद बच्चों को नए कपड़े पहनाए जाते हैं। यह परंपरा विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। गांव की महिलाएं समूह में पारंपरिक टुसू गीत गाते हुए सजी-धजी टुसू चौड़ल लेकर नदी घाट की ओर जाती हैं। नदी में टुसू विसर्जन के साथ पर्व का एक अहम चरण पूरा होता है। इसी अवसर पर नदी किनारे पारंपरिक परकुल मेला लगता है, जो लोगों के लिए खास आकर्षण का केंद्र होता है।

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परकुल मेला, उत्सव और सरकारी उपेक्षा का सवाल

झाड़ग्राम जिले में कांसाई नदी के तट पर लगने वाला बड़ा परकुल मेला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। जंगमहल क्षेत्र से होकर बहने वाली कई छोटी-बड़ी नदियों के किनारे इस समय मेले आयोजित होते हैं, जिनमें स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से आए पर्यटक भी शामिल होते हैं। टुसू गीत, घर में बने पारंपरिक पकवान, मांसाहारी व्यंजन, आपसी मेल-मिलाप और सामूहिक आनंद के बीच यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। हालांकि उत्सव के बीच सरकारी उपेक्षा का मुद्दा भी सामने आता है। टुसू पर्व पर सरकारी अवकाश की मांग लंबे समय से उठती रही है, लेकिन अब तक इसे मान्यता नहीं मिली है। इसके बावजूद लोग नृत्य, गीत और सामूहिक उल्लास के साथ इस पर्व को मनाते हैं और जंगमहल की यह प्राचीन संस्कृति आज भी पूरी जीवंतता के साथ कायम है।


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